अनाज का अनादर न करें, किसी को एक वक्त का खाना मिल जाएगा

दोस्तों आज इस ब्लॉग में एक ऐसी घटना का जिक्र करने जा रहा हूँ जो आपको लगेगा कि यह कोई ख़ास घटना नहीं है पर मेरे लिए यह घटना बहुत ही ख़ास हो गया है. जिसके बारे में मै अभी तक सोचता ही जा रहा हूँ. मतलब इस घटना ने मेरे दिलो दिमाग पर एक गहरी अमित छाप छोड़ दी है. जिसको मै भुला नहीं पा रहा हूँ. रह रह के इस घटना के सीन मेरे मस्तिष्क पटल पर तैरने लगते हैं और मैं व्याकुल हो जाता हूँ. हमारा देश कहाँ से कहाँ पहुँच गया. इंसान चाँद पर पहुँच गया है. सूर्य के पास जाने की तैयारी कर रहा है और आज भी ऐसे लोग हैं। जिनको एक वक्त की रोटी नहीं नसीब नहीं होती है.
अनाज का अनादर न करें, किसी को एक वक्त का खाना मिल जाएगा

घटना कुछ इस प्रकार है कि आज दिन के बारह बजे मैं सब्जी लाने के लिए बाज़ार जा रहा था. इस सिलसिले में मैंने अपनी छोटी सी कार को गैरेज से निकाल रहा था. चूकि बाजार मेरे घर से कुछ दूरी पर है इसलिए गृहस्थी का सामान लाने के लिए मै कार का ही उपयोग करता हूँ. मैंने कार को अपनी गैरेज से अभी निकालकर रोड पर आया भी नहीं था कि एक दस बारह साल का बच्चा नजदीक आकर बोला -अंकल कुछ काम है ? थोड़ी देर तक मैंने उसको देखा. खाली पैर , हाल्फ पैंट और फटा हुआ टी शर्ट पहन कर मेरे सामने खड़ा था. उसके देखते हुए मैंने ना में सर हिलाया फिर कार को आगे बढ़ा दिया. वह मेरी तरफ कातर नज़रों से देखता रहा जब तक की अगले मोड़ पर मैं मुड़ नहीं गया. आगे बढ़ते हुए मैं उसे पीछे की शीशे से देख रहा था.

बाज़ार से गृहस्थी के सामान खरीदने में मुझे करीब करीब दो सवा दो घंटे लग गए. मैं वापस अपने घर के पास पहुंचा ही था कि मेरी नजर उस बच्चे पर पड़ी जो गली के मुहाने पर रखे डस्ट बीन के पास खड़े खड़े कुछ खा रहा था. मेरी कार अनायास कौतुहूलवश उसके पास जाकर रुक गई. मैंने उससे पूछा -क्या खा रहे हो. वह अपनी हाथ फैलाकर दिखाया. उसके हाथ में एक मरा हुआ चूहा था. चूहे को देखकर मुझे उबकाई आने लगी. चूहा का आधा शरीर वह खा चुका था. अपनी उबकाई को रोकते हुए मैंने उसे चूहा फेकने को कहा. पर उसने चूहे को नहीं फेका. मैंने उससे पूछा - क्यों खा रहे हो इतना गंदा चीज. उसने जबाब दिया - और क्या करूँ. खाने को पैसा नहीं है. कोई खाना देता भी नहीं है. मैंने उससे ज्यादा कुछ नहीं बोला. पॉकेट से पचास रुपये का निकालकर दिया और चूहे को फेकने को कहा और बोला जाकर खाना खा लो. उसने पचास को नोट लिया और चूहा फेककर वहां से चला गया.

वह वहां से चला तो गया पर मेरे मन में एक अजीब सी द्वन्द चल रही थी. मेरा मन इस जमाने में ऐसे लोग भी होंगे मानने के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था. बार बार एक ही चीज मेरे मन में आ रही थी कि ऐसा कैसे हो सकता है जब हम हम अपने आपको सभ्य समाज मानते हैं. हमारे पास अनाज की कोई कमी नहीं है फिर भी लोग भूखा रह रहे हैं जिन्हे मजबूरन चूहा खाना पड़ रहा है. 

हालांकि हम अनाज के उत्पादन में आत्म निर्भर तो हो गए हैं पर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो खाना बर्बाद करते हैं. पार्टियों, शादियों, रेस्तरां में खाना खाने जाते हैं तो जरुरत से ज्यादा खाना ले लेते हैं और उसे पूरा नहीं खाते हैं जो बच जाता है उसे डस्ट बीन में फेंक देते है ऐसे लोगों पर मुझे तरस आती है. एक तरफ कुछ लोग भूखे सोते हैं तो दूसरी तरफ कुछ लोग अनाज का कदर नहीं करते हैं.

आज घटित इस घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया है.  इस लेख को पढ़ने वाले लोगों से मै अनुरोध करूंगा कि कृपा करके आप अनाज को बर्बाद ना करे. जितना आपको खाना हो उतना ही लीजिये. अगर आप के खाने से जो भी चीज ज्यादा हो उसे पहले ही निकाल दे. अगर आपके पास जरुरत से ज्यादा अनाज हो तो उसे उन लोगों में बाँट दे जिनको एक शाम का खाना नसीब नहीं होता है. आपकी इस छोटी सी पहल से बहुत लोंगो को एक वक्त का खाना अवश्य मिल जाएगा.


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