पहला दिन- बाढ का प्रकोप

दोस्तो मैं आज से इस ब्लाग पर अपने बारे में या अपने आस-पास दिन प्रतिदिन घटने वाली घटनाओं के बारे में इस पोस्ट पर लिखने की कोशिश करूँगा. अगर आपको अच्छा लगे तो मेरा उत्साह जरूर बढाइएगा. इस ब्लाग पर पहले मैं बच्चो के लिये मोटिवेशनल कहानियाँ पोस्ट करता था. परंतु यह ब्लाग न तो आपको और न तो गूगल का पसंद आया इसलिये मैंने इस ब्लाग से सारे पोस्ट को डिलेट कर नये सिरे से नये टॉपिक यानि अपने बारे में या मेरे आस-पास घटने वाली घटनाओं के बारे में लिखने का निश्चय किया हूँ. आज पोस्ट लिखने का पहला दिन है. और आज में लिखने बैठा तो समझ में नही आ रहा है कि क्या लिखूँ, किसके बारे में लिखूँ.



पहला दिन- बाढ का प्रकोप
Credit: https://www.bbc.com


रात के बारह बज चुके हैं. बहुत सोच विचार के उपरांत मेरे दिमाग के एक कोने से आवाज आई- क्यो न आज मेरे आस-पास घटने वाली किसी सुखद घटना के बारे में लिखुँ . पर लाख मगजमारी के बाद मुझे कोइ भी ऐसी सुखद घटना याद नही आई जिसके बारे में लिखा जा सके. हर जगह दिल दुखाने वाली ही घटना ही सुनाई दे रही है. चाहे टी.वी पर हो अथवा समाचार पत्र या सोशल मिडिया हर जगह ऐसी ही घटनाओ का बोलबाला है. मेरे आस-पास घटने वाली सभी घटनाएँ महत्वपूर्ण है. मेरा ऐसा मानना है कि सभी घटनाओं को बराबर की तरजीह मिलनी चाहिए. पर समय की पाबंदी और जगह की कमी के कारण मैं इस ब्लाग में सभी घटनाओ का उल्लेख तो नही कर सकता हूँ.

पर इन सभी घटनाओं में से एक घटना जो मुझे बहुत ही महत्वपूर्ण लगी(शायद आप को महत्वपूर्ण न लगे) जो मुझे विचलित करती है- वह है पूरे भारत में बाढ की समस्या. वैसे तो हमारे देश में बाढ प्रतिवर्ष आती है. कभी बिहार में तो कभी गुजरात मे. कभी आसाम में तो कभी राजस्थान मे. बाढ से हर साल जान माल की क्षति होती है. लाखो करोडो रुपये का नुक्सान होता है. बाढ में हजारो लोग बह जाते है. बाढ के बाद होनेवाली महामारी से हजारो लोग बीमारी से मर जाते है.

इस वर्ष हमारे देश में प्रचंड गर्मी पड़ी. लोग गर्मी से परेशान थे. मानसुन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे ताकि गर्मी से कुछ राहत मिले. मानसुन तो आया पर रुलाकर यानि थोडी देर से, आते ही मानसुन ने ऐसा कहर बरपाया कि लोग त्राही-त्राही करने लगे. जहाँ पहले बारिश नही होती थी वहाँ मुसलाधार बारिश हो रही है और जहाँ पहले बारिश होती थी वहाँ एक बूंद भी पानी नही पड़ा यानि वहाँ सुखाड हो गया . इस वक्त दिल्ली और गुजरात के जूनागढ़ में बाढ़ की विभीषिका मुझे विचलित कर रही है. बाढ़ का पानी शहर में घुस गया है. सड़कों पर मवेशी, आदमी, कारें तैर रही हैं. अभी कुछ दिनों पहले एक टी वी चैनल पर एक बाढ़ का एक दृश्य दिखा रहा था जिसमे सड़क पर बाढ़ का पानी बाह रहा है. एक कार भी उसमे बाह रहा है जिसमे कुछ लोग बैठे हुए है. कार के बाहर एक व्यक्ति कार को रोकने की कोशिश करते करते खुद बहने लगा. कार के अंदर से एक बच्चे की चिल्लाने की आवाज आ रही है- पापा! पापा! पापा गए..... बड़ा ही डरावना दृश्य था. पता नहीं वह व्यक्ति या वह पूरा परिवार जो उस कार में सवार था बचा की नहीं, मुझे नहीं पता. इस प्रकार के भयावह दृश्य हर साल दिखने को मिल जाते हैं. कुछ दिनों तक बाढ़ की चर्चा होती है फिर जिंदगी आगे चल पड़ती है. लोग या हम लोग बाढ़ को भूल जाते हैं. जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

एक हिसाब से देखा जाय तो सारी दुनिया में मौसम एक दम से 360 डिग्री बदल गया है. मौसम विज्ञानी आश्चर्य चकित हैं मौसम के इस बदलाव से. जिस तरह से मानव जाति ने विकास के नाम पर प्रकृति को छेड़ा है मेरे खयाल से यह सब उसी का परिणाम है. लोगो ने अपने स्वार्थ के लिये क्या क्या नहीं किये. नदियो-नालो की जमीन पर कंक्रीट के जंगल खडा कर दिये. जंगल की जमीन को हथिया लिया. हरे भरे पेडो को काट दिया. मतलब प्रकृति से खिलवाड़ किया। ग्लैशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है. जिसके कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है. बिगड़ रहा है क्या बिगड़ चुका है.

हम सभी जानते हैं कि प्रकृति अपने आपको इस विधि से या उस विधि से समय समय पर अपने आपको संतुलित करती रहती है. प्रकृति के इस संतुलन के प्रयास में मानव जाति को अपने किये का परिणाम तो भुगतना ही पडेगा.

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